अन्तर्राष्ट्रीय ज्योतिष संगोष्ठी: तथाकथित ज्‍योतिषी शास्‍त्र का दुरूपयोग करते हैं, इनसे बचना चाहिए…..

आशुतोष त्रिपाठी 

वाराणसी।आज ज्योतिष विभाग द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के तीसरे दिन के चतुर्थ सत्र का शुभारम्भ वैदिक मंगलाचरण से किया गया। जिसमें तिरुपति के डा कृष्ण कुमार भार्गव जी ने कहा कि दक्षिण भारत में कुण्डली मिलान, जिसे दसकूट मिलान भी कहा जाता है, विवाह के लिए वर और वधू की कुंडलियों का मिलान करने की एक विधि है, जिसमें 10 अलग-अलग पहलुओं पर विचार किया जाता है, जिनमें से प्रत्येक को अलग-अलग गुण दिए जाते हैं।कुंडली में ये सभी मिलकर 36 गुण होते हैं, जितने अधिक गुण लड़का लड़की के मिलते हैं, विवाह उतना ही सफल माना जाता है। 

उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. देवी प्रसाद त्रिपाठी जी ने कहा कि जीवन में परेशानियों का आना स्‍वाभाविक है, व्‍यक्ति जीवन में आने वाले इन परेशानियों के निवारण हेतु ज्‍योतिषियों की शरण में जाते है, लेकिन आज के इस व्‍यवसायिक माहौल में तथाकथित ज्‍योतिषी लोगों की परेशानियों की आड़ में शास्‍त्र का दुरूपयोग करते हुए उनका फायदा उठाने लगते है। समाज को ऐसे नामधारी ज्‍योतिषियों से बचना चाहिए जिनका एकमात्र लक्ष्‍य आर्थिक दोहन है। 

जम्मू-कश्मीर से आये डॉ विक्की शर्मी जी ने कहा कि कुंडली मिलान या गुण मिलान वैदिक ज्योतिष में विवाह के लिए कुंडलियों का मिलान है। हिन्दू धर्म और खासकर हिंदुस्तान में विवाह बुजुर्गो और माता पिता के आशीर्वाद से संपन होते है, इसलिए विवाह के लिए कुंडली मिलान का काफी उच्च महत्व है और कुंडली मिलान के बाद ही विवाह निश्चित किये जाते है। कुंडली मिलान के माध्यम से ये पता चलता है की किस स्तर तक ग्रह वर और वधु को आशीर्वाद दे रहे है और कौन से ज्योतिष परिहार करने से विवाह में खुशियां आ सकती है।

उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय हल्‍द्वानी के डा. रंजीत दुबे ने बताया कि ग्रहो और खगोलीय पिंड का हमारे जीवन पर अच्छा खासा प्रभाव पड़ता है इसलिए जब भी विवाह की बात आये तो ये जरुरी है की ग्रह अपना आशीर्वाद दे ताकि वैवाहिक जीवन में लड़का और लड़की के बीच सामंजस्य रहे, खुशियां, सफलताएं और शांति आये।

लखनऊ के डा. अनिरुद्ध शुक्ल जी ने बताया कि कुंडली मिलाते हुए गुण मिलान में नाड़ी कूट को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। अगर नाड़ी कूट प्रतिकूल है तो २८ गुणों का मिलान भी अशुभ माना जायेगा। गुण मिलान में अधिकतम ३६ गुण होते है। अगर भकूट और नाड़ी कूट अनुकूल है तो ३१ से ३६ गुणों का संयोजन सर्वश्रेष्ट माना जायेगा , २१ से ३० गुण बहुत अच्छे , १७ से २० मध्यम और ०-१६ गुण अशुभ होंगे।

उत्तराखंड के डा नन्दन तिवारी जी ने कहा कि एक सफल गृहस्थ जीवन के लिए पति-पत्नी के बीच गुणों का मिलना बहुत जरुरी होता है, ये गुण कुंडली के द्वारा मिलाए जाते हैं। किसी भी मनुष्य की कुंडली उसकी जन्म तारीख, समय और स्थान के आधार पर बनाई जाती है। जन्म के समय गृह नक्षत्रों की स्थिति को देखते हुए ये कुंडली बनती है। फिर शादी के समय लड़का लड़की का कुंडली मिलान होता है।

केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय लखनऊ के प्रो. मदनमोहन पाठक जी ने कहा कि पंचाग की महत्ता पर प्रकाश डाला।  

अध्यक्षीय उद्बोधन प्रो. नागेन्द्र पाण्डेय जी ने किया। 

कार्यक्रम का संचालन विभाग के सहायक आचार्य डॉ रामेश्वर शर्मा जी ने, स्वागत विभागाध्यक्ष प्रो. शत्रुघ्न त्रिपाठी जी ने, धन्यवाद ज्ञापन प्रो. विनय कुमार पाण्डेय जी ने किया। 

इस अवसर पर प्रमुख रूप से डा निर्भय पाण्डेय, डॉ लोकेश्वर शर्मा, प्रो. अशोक थपलियाल, डॉ अधोक्षज पाण्डेय, डा निगम पाण्डेय प्रो. कृष्णेश्वर झा, डॉ. राहुल मिश्र आदि उपस्थित रहे।

पंचम सत्र में अध्‍यक्षता करते हुए प्रो. रामजीवन मिश्र ने कहा कि आज के सन्‍दर्भ में सामयिक पंचांग की व्‍यवस्‍था पर परिचर्चा अत्‍यन्‍त लोकोपयोगी है। मुख्‍य वक्‍ता प्रो. गिरिजा शंकर शास्‍त्री ने बताया कि मेलापक का औचित्‍य आज के सन्‍दर्भ में अत्‍यन्‍त प्रासंगिक है। 

मुख्‍य अतिथि प्रो. सदानन्‍द शुक्‍ल ने ज्‍योतिष विभाग को इस उत्‍तमोत्‍तम परिचर्चा हेतु बधाई एवं आशीर्वाद दी। 

सत्र संचालन डॉ. गणेश  प्रसाद मिश्र ने किया। 

समापन सत्र का प्रारम्‍भ पारंम्‍परिक रूप से दीपप्रज्‍ज्‍वलन, मॉं सरस्‍वती एवं मालवीय जी की प्रतिमा पर माल्‍यार्पण के साथ हुआ। वैदिक मंगलाचरण डॉ. कृष्‍ण मुरारी त्रिपाठी ने एवं कुलगीत की प्रस्‍तुति विभागीय छात्राओं द्वारा किया गया। 

नेपाल से पधारे सम्‍मानित अतिथि प्रो. जयन्‍त आचार्य ने पंचांग के लिए निर्बीज व्‍यवस्‍था को प्रबलता से उपस्‍थापित किया तथा भविष्‍य में ज्‍योतिष विभाग को सामयिक समस्‍याओं के समाधान हेतु प्रतिनिधित्‍व करने का आग्रह भी किया। 

दूसरे सम्‍मानित अतिथि प्रो. चन्‍द्रमौली उपाध्‍याय ने विभाग को परम्‍परा के संरक्षण हेतु तत्‍पर रहने पर बधाई दी तथा भविष्‍य में ऐसे सम्‍मेलन के आयोजन की आवश्‍यकता पर बल दिया। 

सारस्‍वत अतिथि प्रो. रामचन्‍द्र पाण्‍डेय ने अतीव गम्‍भीर विषय के परिचन्‍तन हेतु विभाग को साधुवाद दिया तथा भविष्‍य में और सुदृढ़ तरीके से परिचर्चा को आवश्‍यक बताया। 

विशिष्‍ट अतिथि पद्मश्री प्रो. कमलाकर त्रिपाठी ने आज के समाज में व्‍याप्‍त विवाह सम्‍बन्‍धी कठिनाईयों के समाधान हेतु ज्‍योतिषशास्‍त्र को आवश्‍यक बताया तथा भविष्‍य में ऐसे विषयों पर चिन्‍तन हेतु परिचर्चा आयोजित कराने की अनुशंसा की। 

मुख्‍य अतिथि प्रो. देवी प्रसाद त्रिपाठी ने पंचांग हेतु उपयुक्‍त निर्बीज व्‍यवस्‍था को समुचित बताते हुए मेलापक हेतु कुण्‍डलियों के सर्वेक्षण पर अधिक बल दिया। 

अध्‍यक्षीय उद्बोधन में प्रो. राजाराम शुक्‍ल ने त्रिदिवसीय ज्‍योतिष विभागीय आयोजन को मानव हिताय उपयोगी बताया तथा भविष्‍य में ऐसे आयोजनों को व्‍यवहारिक दृष्टि से विश्‍व हेतु कल्‍याणकारक बताया। 

विशेष रूप से स्‍वागत के साथ सम्‍मेलन की उपलब्धियों का जिक्र करते हुए प्रो. विनय कुमार पाण्‍डेय ने बताया कि निर्धारित दो विषयों में से प्रथम विषय पंचांग की शास्‍त्रीय व्‍यवस्‍था (सबीज-निर्बीज) के सन्‍दर्भ में कुल 63 विद्वानों ने अपने मत प्रस्‍तुत किए जिसमें से तिथि आदि पंचांग साधन हेतु 55 लोगों ने निर्बीज सूर्य व चन्‍द्रमा तथा सात लोगों ने सबीज सूर्य व चन्‍द्रमा तथा एक ने संदिग्‍धता प्रदर्शित की। इस प्रकार 87 प्रतिशत पंचांगकारों/ज्‍योतिषियों ने धर्मशास्‍त्रीय व्‍यवस्‍थसा अनुपालन हेतु निर्मित होने वाले पंचांगों में तिथि आदि साधित होने वाले पारम्‍परिक रूप से निर्मित हो रहे सूर्यसिद्धान्‍तादि मत का समर्थन करते हुए पंचांग निर्माण पर अपनी सहमति बनाई तथा इस क्षेत्र में ज्‍योतिष विभाग, काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय द्वारा लिए जाने वाले निर्णयों के पक्ष में सर्वदा खड़े रहने का आश्‍वासन दिया। मांगलिक विचार के क्रम में विद्वानों ने सामाजिक एवं शास्‍त्रीय व्‍यवस्‍थाओं में तालमेल स्‍थापित करते हुए विवाह मेलापक पर विचार करने का मत प्रस्‍तुत किया। 

धन्‍यवाद ज्ञापन के क्रम में प्रो. शत्रुघ्‍न त्रिपाठी ने प्रत्‍यक्ष एवं परोक्ष सभी रूप में उक्‍त सम्‍मेलन में सहयोग करने वाले सभी सभ्‍यजनों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की तथा सम्‍मेलन की उप‍लब्धि के आधार पर आगे विभाग द्वारा निर्बीज सम-सामयिक पंचांग निर्माण की योजना को महत्‍वपूर्ण बताया। 

सत्र का संचालन डॉ. सुभाष पाण्‍डेय जी ने किया। सम्‍मेलन में लगभग 300 से अधिक विद्वानों, शोधछात्रों ने प्रतिभाग किया।