अन्तर्राष्ट्रीय ज्योतिष सम्मेलन: तृतीय सत्र का शुभारंभ वैदिक मंगलाचरण से हुआ

वाराणसी। शुक्रवार को ज्योतिष विभाग द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय ज्योतिष सम्मेलन के दूसरे दिन तृतीय सत्र का शुभारंभ वैदिक मंगलाचरण से हुआ।

श्री दामोदर बंसल जी ने पंचांग के महत्व पर प्रकाश डाला। श्री लालबहादुर शास्‍त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग के सहायक आचार्य डॉ. होमेश पाराशर ने कहा कि विवाह मेलापक के विषय में आठ प्रकार के विवाह होते हैं। विवाह धर्मशास्त्रीय व्यवस्था है जिसमें कुण्डली मिलाकर विवाह करने की परम्परा है। विवाह के समय अष्टकूट का विचार करते हैं तो सुखमय दाम्पत्य जीवन व्यतीत होता है। 36 गुण में से 16 गुण मिलने पर अधम माना जाता है 16 से 20 तक मध्यम माना जाता है, 20 से ऊपर गुण उत्तम माना जाता है।

हिमाचल आदर्श संस्कृत महाविद्यालय के ज्योतिष विभाग के सहायक आचार्य डॉ. लोकेश्वर शर्मा ने कहा कि तिथि, वार, योग, नक्षत्र, करण का ज्ञान कराने वाले को पंचांग कहते हैं। वर्ण से हम पति-पत्नी के कार्यक्षाता को पता करते हैं। ताराओं से हम एक-दूसरे के समझने की स्थिति का पता करते हैं। ग्रहमैत्री से वर-वधू की प्रकृति का विचार करते हैं। भकूट से जीवन शैली का विचार करते हैं।

नेपाल संस्कृत विश्वविद्यालय के आचार्य जयंत जी ने कहा कि 90% लोग वैदिक सनातन व्यवस्था को मानते हैं और पंचांग को बहुत महत्व देते हैं। पंचांग के अनुसार ही व्रत-पर्व का पालन करते हैं।

नीमच, राजस्थान से पधारे पंचागकार पं. भागीरथ जोशी जी ने कहा कि मेलापक में सबसे पहले आयु, स्वभाव, गुण का विचार करना चाहिए, भले गुण कम मिल रहे हों यदि स्वभाव दोनों का अच्छा है तो दाम्पत्य जीवन सुखमय रहेगा। 

आचार्य खींवराज शर्मा ने कहा कि मुहूर्त का महत्व इसलिए है क्योंकि यह ज्योतिष के अनुसार किसी भी शुभ कार्य को शुरू करने के लिए सही समय का निर्धारण करता है, जिससे कार्य में सफलता और बाधाओं से बचाव होता है। 

गया, बिहार से आये डॉ. अम्बुज त्रिवेदी ने कहा कि पंचाग काल का विधान करता है, पंचांग में अन्तर का प्रमुख कारण है  स्थान भेद, काल भेद है। 

इंदौर, मध्यप्रदेश के आचार्य पं. दिनेश शर्मा ने पंचांग में व्याप्त भ्रान्तियों का जिक्र किया। पंचांग हिंदू धर्म में समय गणना और शुभ-अशुभ मुहूर्त जानने का एक महत्वपूर्ण उपकरण है, जो तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण के आधार पर बनाया जाता है। पं. दिनेश शर्मा ने काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय के इस महत्‍वपूर्ण सम्‍मेलन से प्रभावित होकर आगामी अक्‍टूबर 2025 में अपनी संस्‍था के साथ संयुक्‍त रूप से अन्‍तर्राष्‍ट्रीय ज्‍योतिष सम्‍मेलन काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय में करने का प्रस्‍ताव दिया। 

दिल्ली के आचार्य धनंजय पाण्डेय ने कहा कि ज्योतिष को लेकर मीडिया में बहुत भान्तियां ज्योतिष के नाम से फैलायी जाती है। पंचांग वैदिक ज्योतिष से जुड़ा है और आकाशीय पिंडों की दैनिक गतिविधियों का विवरण देता है। ऐसे में काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय के ज्‍योतिष विभाग का यह उपक्रम अत्‍यन्‍त सराहनीय है।

हरिद्वार से आये श्री रमेश सेमवाल जी ने कहा कि ज्योतिष शास्त्र सूक्ष्म विवेचन का शास्त्र है। पंचांग का शाब्दिक अर्थ है- पांच अंग। इसे हिंदू काल गणना की रीति से निर्मित पारंपरिक कैलेंडर या कालदर्शन को कहते हैं। इसमें सारणी या तालिका के रूप में महत्वपूर्ण सूचनाएं अंकित होती हैं जिनकी अपनी गणना पद्धति है। अपने विभिन्न रूपों में यह लगभग पूरे नेपाल और भारत में प्रचलित है। 

मुख्यवक्ता के रूप में कविकुरुगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय नागपुर के प्रो. कृष्ण कुमार पाण्डेय जी ने कहा कि गणित वेध का विषय है, गणित व्युत्पत्ति का सहारा लेकर हम पंचांग तैयार कर सकते हैं। ग्रहण को दृक् सिद्ध ही लेना उचित है। वर- कन्या के  शील स्वभाव का विचार करते हुए मेलापक करना चाहिए। 

अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. भरत भूषण मिश्र ने कहा कि समय आ गया है कि हम सभी ज्‍योतिर्विद एकत्रित होकर सनातन एवं धर्म की रक्षा हेतु एक निर्णय ले तथा उस निर्णय से सरकार को अवगत करायें जिससे धार्मिक पुण्‍य के साथ परम्‍परा का संक्षण भी संभव हो सके। 

कार्यक्रम में पं. लेखराज शर्मा जी द्वारा ज्‍योतिषशास्‍त्र की वैज्ञानिकता एवं ग्रहों का मानव जीवन से सम्‍बन्‍ध को प्रायोगिक तौर पर हस्‍तरेखा देखकर जन्‍मतिथि, समय आदि का सजीव प्रदर्शन किया गया।

कार्यक्रम का संचालन विभाग के आचार्य डॉ. रामेश्वर शर्मा जी ने तथा स्वागत एवं सम्‍मान विभागाध्यक्ष प्रो. शत्रुघ्न त्रिपाठी जी ने एवं धन्यवाद ज्ञापन प्रो. विनय कुमार पाण्डेय जी ने किया।

भोजनोपरान्‍त चतुर्थ सत्र के अन्‍तर्गत पत्र वाचन में पटना से आये राघव झा जी ने कहा कि सनातन की सभी व्यवस्था पंचांग पर आधारित है। प्राचीन काल में इसमें कोई भिन्नता नहीं थी। लेकिन वर्तमान दौर और सिद्धांत भेद के चलते ग्रहों के गणितीय मान और उससे बनने वाली तिथियों और दिनों में भी अंतर दिखने लगा है। इस वजह से व्रत और त्योहारों की तिथियों के निर्णय पर असर पड़ रहा है। इससे समाज में भ्रम की स्थिति बन रही है।

शोधछात्र ऋषिरंजन ने कहा कि मुहूर्त की तरह कुंडली से गुण-दोषों को भी मिलाना बहुत जरूरी है। जबकि कई लोग ऐसे हैं, जिन्हें लगता है मेलापक यानी कि कुंडली आधारित विवाह से बहुत विलंब हो जाता है।

तिरुपति से आये मुख्‍य वक्‍ता प्रो. कृष्णेश्वर झा ने कहा कि मेलापक दांपत्य जीवन की समग्रता और अनुकूलता का एक आधार स्तंभ होता है। ऐसे में सामाजिक और शास्त्रीय विषयों में समन्वय कैसे किया जाए, इसका जवाब ढूंढना आवश्‍यक है।

सत्राध्‍यक्ष प्रो. वासुदेव शर्मा जी ने सबीज पर कटाक्ष करते हुए कहा कि बाहर से डेटा कलेक्ट कर पंचांग बना लिया गया हो तो उसे सबीज कहा जायेगा। साथ ही किसी पारंपरिक ग्रंथ को नहीं पढ़ा गया हो। वहीं निर्बीज में सूर्य सिद्धांत और अन्‍य शास्त्रों के अध्ययन के तहत पंचांग बनाये जाते हैं।

लखनऊ के प्रो. हरिनारायण द्विवेदी ने कहा कि एक स्‍थान हेतु पंचांग निर्माण सम्‍बन्‍धी गणित की सूक्षमता को ध्‍यान में रखते हुए पंचांगों का निर्माण करना चाहिए, जिससे भिन्‍नता की स्थिति न उत्‍पन्‍न हो।

दुबई के आचार्य पवन जी ने पंचांगों में भेद क्यों हैं, किस व्यवस्था को स्वीकारा जाए, प्रचलित व्यवस्थाओं में सामंजस्य कैसे स्थापित किया जाए और सनातन धर्मानुकूल व्यवस्था के संरक्षण के लिए कौन सी शास्त्रीय व्यवस्था बनाई जाए आदि महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर चर्चा की।

सत्र का संचालन डॉ सुशील कुमार गुप्‍ता जी ने तथा स्वागत पूर्व अध्यक्ष प्रो विनय कुमार पाण्डेय जी ने एवं धन्यवाद ज्ञापन विभागाध्यक्ष प्रो. शत्रुघ्न त्रिपाठी जी ने किया। इस कार्यक्रम में प्रमुख रूप से प्रो. चन्‍द्रमौली उपाध्‍याय, डॉ. पारस नाथ ओझा, प्रो. प्रेमकुमार शर्मा, सुनील जैन, डॉ अनुज मिश्र, डा. अवधेश श्रोत्रिय आदि सहित लगभग 250 छात्र उपस्थित रहे।