भारत की आजादी के 75 साल और राजनीतिक दलों में लोकतंत्र कितना यथार्थ, कितना छलावा ?


  डाॅ. अवध नारायण त्रिपाठी(स्वतंत्र चिन्तक)

हम यह कहते हुए गर्व महसूस करते है कि हम दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र हैं।  छठी सदी ईस्वी पूर्व लिच्छवि में गणतंत्रीय प्रणाली के स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध है । 1947 में भारत की आजादी के बाद हमने लोकतंत्र का विकल्प चुना । आज जरूरत है इन 75 वर्ष के भारतीय लोकतंत्र और इसके रक्षा का ध्वज वाहक बनने वाली राजनीतिक दलों की आन्तरिक लोकतंत्र पर भी चर्चा करना जरूरी हो जाता है।  एक बहुत पुरानी लोक कहावत है कि ” पहले घर में दिया जलाया जाता है , उसके बाद मंदिर में जलाते हैं “। भारत के राजनीतिक दल इस कसौटी पर कितना खरा उतरते हैं  और आगे लोकतंत्र का भविष्य या स्वरूप कितना सुरक्षित है  ? जरूरत है इन सभी पहलुओं पर गंभीर व ईमानदार चर्चा की, इस चर्चा से हम लम्बे समय तक भाग नहीं सकते ।


    आजादी के समय भी विभिन्न विचारधाराओं के बैनर तले समान विचार के लोग एकजुट होकर अपने अपने तरीके से अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे । इसमें कुछ जन आन्दोलनों का नेतृत्व कर रहे थे तो कुछ छिटफुट हिंसा व विद्रोह का रास्ता अपनाए थे । नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिन्द फौज ने तो वर्मा के रास्ते भारतीय ब्रिटिश हुकूमत पर हमला करके उसे करारी शिकस्त भी दी थी और उससे उपजा भारतीय नौसेना का विद्रोह ने भारत में स्थित ब्रिटिश हुकूमत को सचेत कर दिया कि यही  समय है कि वह भारत से जाने के लिए अपना बोरिया बिस्तर बाॅध ले । इसके बाद चला सत्ता हस्तांतरण का खेल और एक बार फिर हमारे नेतृत्व की अक्षमता व फूट के कारण हमें आधे अधूरे भारत की आजादी से संतोष करना पड़ा।


        आजादी की लड़ाई में किसी के योगदान को कम या अधिक कहना उचित नहीं होगा । अपने अपने तरीके से अपने संसाधनों के अनुरूप देश के हर कोने से आजादी के मतवालों ने अपनी जीवन की आहुति दी , जिसे कमतर कहना उनके बलिदान का अपमान होगा । यह भी उतना ही सच है कि गाँधी के नेतृत्व में देश के हर हिस्से का युवा जिस तरंगे के नीचे इकट्ठा हुआ , वह काॅग्रेस थी । उन दिनों काॅग्रेस न तो एक परिवार की पार्टी थी और न ही एक विचार की पार्टी थी अपितु काॅग्रेस देश के चुने हुए विभिन्न विचारधाराओं के नेताओं का एक समुच्चय थी जिनकी एक बात पर आम सहमति थी और वह थी ब्रिटिश हुकूमत से भारत की आजादी । यद्यपि अनेक विषयों पर उनमें मतभेद था किन्तु भारत की आजादी वह मूल मंत्र थी जिसके इर्द-गिर्द यह सभी एकजुट थे ।


   1885 में स्थापित ए ओ ह्यूम की काॅग्रेस ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संभावित विद्रोह को शान्त करने के ” सेफ्टी वाल्व ” के रूप में जरूर बनी लेकिन धीरे धीरे यह ब्रिटिश हुकूमत से अनुनय विनय व अनुरोध पत्र देने की जगह ” लाल ,बाल , पाल ” की ” स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर ही रहेंगे ” की राह पर बढ़ चली थी  । इस बीच गाॅधी का भारतीय राजनीति में आगमन हुआ।  
गांधी का पहला देशव्यापी आन्दोलन “असहयोग आंदोलन” था जिसका आरंभ 1अगस्त 1920 से होना था । संयोग से उस समय काॅग्रेस व देश के सबसे प्रमुख नेता बाल गंगाधर तिलक का 31 जुलाई 1920 को स्वर्गवास हो गया । इस प्रकार उस रिक्तता को भरने का गाॅधी जी को सुनहरा अवसर मिल गया । गांधी भारत की जनता की नब्ज को बहुत अच्छी तरह पहचानते थे ।

यही कारण है कि उनके आवाहन पर देश का आमजन अपना सबकुछ त्याग कर निकल पड़ता था लेकिन यह भी उतना ही कटु सत्य है कि गाँधी ने किसी आन्दोलन के तार्किक परिणति पहुँचने के पहले ही अपने कदम पीछे हटा लिए ।वह चाहे असहयोग आंदोलन हो , सविनय अवज्ञा आन्दोलन,  भारत छोड़ो आंदोलन अथवा देश विभाजन को रोकने का असफल प्रयास। शायद यह विश्व इतिहास का एकमात्र ” अहिंसा का पुजारी ” एक ऐसे आभा मण्डल से आच्छादित रहा जो किसी भी आन्दोलन में सफल न होकर भी इतनी प्रतिष्ठा पा सका । यह अपने आप में एक लम्बे, ईमानदार व गहन शोध का विषय बनता है ।


   स्वतंत्रता मिलने पर काॅग्रेस को इस ऊचाई पर ले जाने व कांग्रेस के सर्वमान्य नेता होने के बावजूद गाॅधी जी की यह सलाह कि काॅग्रेस दल का उद्देश्य पूरा हुआ , अब इसे भंग कर इसे सामाजिक कार्यों पर ध्यान देना चाहिए । इसे भी तत्कालीन सत्ता लोलुप काॅग्रेसियों ने अनसुना कर दिया और काॅग्रेस जिसका उद्देश्य ही तमाम विरोधियों विचारवालों को भी साथ लेकर देश को स्वतंत्र कराना था , स्वतंत्रता के पश्चात कुछ खास लोगों की निजी पार्टी बन कर रह गयी ।


   नेहरू के तमाम निर्णयों से असहमत लोगों ने अलग राजनीतिक दल बनाए इसमें भारतीय जनसंघ, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी तथा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी आदि दल थे । यह सभी किसी खास विचारधारा से प्रभावित नेताओं का दल था ।लेकिन कालान्तर में सत्ता की चकाचौंध ने विचारों पर निजी व परिवार के स्वार्थ को महत्व दिया और हर महत्वाकांक्षी व्यक्ति अपने स्वार्थपूर्ति के लिए दल विशेष का गठन कर अपने व अपने परिवार के हित की रक्षा में जुट गया बाकी सभी बातें केवल जनता को बहलाने का बाह्याडम्बर मात्र रही और सभी के मूल में अपना व अपने परिवार के वर्चस्व को स्थापित करना रहा ।


        हमारे संविधान निर्माताओं ने जिस स्थिति की कल्पना भी नहीं की थी , आज की राजनीति उस रसातल तक पहुँच चुकी है। लोकतंत्र में बहुदलीय प्रणाली का निर्णय शायद हमारे संविधान निर्माताओं की बड़ी भूल थी । द्वि या तृ दलीय प्रणाली इस देश के लिए शायद ज्यादा लाभकर होती । आइए अब आज की राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली का एक विहंगावलोकन करते हैं -काॅग्रेस पार्टी दो बैलों की जोड़ी से , हल जोतता किसान के बाद आज हाथ के पंजे तक आ चुकी है । इस बीच नेहरूजी के समय में ही इन्दिरा गाँधी जी को बढ़ावा दिया जाने लगा । खैर , नेहरू जी की मृत्यु के बाद लाल बहादुर शास्त्री जी के हाथ में देश का नेतृत्व आया किन्तु जिस तरह से शास्त्री जी की मौत हुई वह आज भी संदेह के घेरे में है । इसके बाद इन्दिरा गांधी जी सत्ता में आई ,उनकी हत्या के बाद जिस प्रकार राजीव गांधी जी को आनन फानन में देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठाया गया वहीं से काॅग्रेस पूरी तरह से एक परिवार की पार्टी बनकर रह गयी । आज सोनिया गाँधी और उनकी संतान राहुल व प्रियंका स्वघोषित काॅग्रेस के “आलाकमान ” हैं।

आज सोनिया गाँधी के परिवार की परिक्रमा करने वाला ही काॅग्रेस में रह सकता है । यही कारण है कि कभी देश पर एकछत्र शासन करने वाली काॅग्रेस आज एक परिवार तक सिमट कर रह गयी है , यद्यपि आज भी काॅग्रेस में अच्छे व योग्य नेता हैं लेकिन सोनिया परिवार से इतर किसी नेता को आगे बढ़ने के लिए कोई संभावना नहीं। परिणाम काॅग्रेस का संकुचन रोकना संभव नहीं।  लोकतंत्र की दुहाई देने वाली एक राष्ट्रीय दल अपने अंदर राजतंत्र अथवा वंशवाद  का पक्षधर होकर कैसे देश की जनता का विश्वास प्राप्त कर सकती है ? काॅग्रेस को इस सवाल से निकले बिना अब उसका कोई भविष्य नहीं ।


  काॅग्रेस के बाद देश में आज जितने भी राजनीतिक दल हैं,  वह सभी ( सपा , बसपा , रालोद , राजद ,लोजपा ,जदयू , बीजद , नेशनल कांफ्रेंस, शिव सेना , एन सी पी , आम आदमी पार्टी ,  तृणमूल कांग्रेस, ए डी एम के , ए आइ डी एम के , झारखण्ड मुक्ति मोर्चा आदि आदि ) किसी राज्य विशेष में किसी कद्दावर नेता द्वारा अपने राज्य विशेष में अपनी अलग पहचान बनाए रखने के लिए बनाए गये , जो सभी अपनी लोकप्रियता के बल पर स्थानीय मुद्दों,  जातीय व धार्मिक समीकरण के आधार पर सत्ता पर कब्जा जमाने में सफल हुए और आगे उस दल का नेतृत्व उसके परिवार के सदस्यों के हाथ में जाता है । यह लोकतंत्र का गला घोंटना नहीं तो और क्या कहा जा सकता है ?


   अभी देश की दो विचारधारा की संवाहक दलों पर चर्चा करना भी जरूरी है।  उसमें से एक है वामपंथी विचारधारा की कम्युनिस्ट पार्टी। कम्युनिस्ट सिद्धांततः लोकतंत्र में विश्वास नहीं रखते है इसका ज्वलंत उदाहरण पड़ोसी देश चीन है । अतः भारत में इसके पनपने व विस्तारित होने की संभावना नहीं थी फलतः यह धीरे धीरे स्वतः भारतीय जमीन से कटती चली गयी ।


       अब बची तथाकथित दक्षिण पंथी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करने वाली भारतीय जनसंघ पार्टी जो अब नये कलेवर में भारतीय जनता पार्टी ( भाजपा ) के रूप में देश की सत्ता पर काबिज है । भाजपा मूलतः कहीं न कहीं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ समर्थित राजनीतिक दल है । आर एस एस स्वयं को एक गैर राजनीतिक संगठन बताता है और इसके बीसियों आनुसांगिक संगठन अपने अपने तरीके से आदिवासियों,  वनवासियों,  सीमान्त राज्यों में  सामाजिक,  आर्थिक व शैक्षणिक गतिविधियों द्वारा लोगों को जोड़ने का काम कर रहे हैं। इनके कार्यकर्ताओं को एक संगठन से दूसरे संगठन में उनकी योग्यता व जरूरत के अनुसार भेजे जाने की परंपरा है । इस प्रकार एकदम नितान्त अनजान दूरदराज के लोगों को भी देश की मुख्य धारा से जुड़ने और अपनी योग्यता अनुसार काम करने का सुअवसर मिलता रहता है । यही कारण है कि भाजपा का बहुत कुछ नीति व निर्णय संघ ( आर एस एस ) द्वारा निर्धारित किया जाता है ।भारतीय जनसंघ , डाॅ श्यामाप्रसाद मुखर्जी से , पंडित दीन दयाल उपाध्याय तक और पुनः अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी के बाद अब नरेन्द्र मोदी, अमित शाह तक का जो लम्बा सफर तय की है और एक परिवार की जगह एक विचारधारा का ध्वजवाहक बनकर निरंतर आगे बढ़ रही है, उसका सबसे बड़ा कारण है कि इसमें आन्तरिक लोकतंत्र बना हुआ है और प्रखर वक्ता तथा जनता की समस्याओं से सरोकार रखने वाले नेताओं को आगे रखकर वह  अपने जनाधार का निरंतर विस्तार करने में अब तक सफल रही है ।


                उपरोक्त तथ्यों का गंभीरतापूर्वक अध्ययन करने से एक बात साफ उभरकर आती है यदि भाजपा के अलावा अन्य राजनीतिक दलों को आगे की राजनीति में अपने को प्रासंगिक बनाए रखना है तो उनके लिए यह जरूरी है कि वह परिवारवाद से बाहर निकलकर योग्य नेतृत्व को आगे बढ़ने का अवसर दें साथ ही देशहित में बहुदलीय प्रणाली पर रोक लगाना भी आज की जरूरत है।  यदि इसके लिए चुनाव आयोग , सर्वोच्च न्यायालय व संसद मिलकर ईमानदार पहल करे तभी यह संभव है जिसके लिए सभी दलों को निजी स्वार्थ को त्याग कर आगे आने की जरूरत है अन्यथा देश एक दलीय शासन के अधीन चला जायगा और यह देश के लोकतंत्रीय प्रणाली के लिए उचित नहीं है। जय हिन्द।

     वाराणसी