आशुतोष त्रिपाठी
वाराणसी।अपनी अनादि आध्यात्मिक चेतना, कालजयी सांस्कृतिक विरासत और अटूट ‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’ के लिए वैश्विक पटल पर विख्यात काशी इन दिनों दो दिल दहला देने वाली घटनाओं से सिहर उठी है. जिस शहर की सुबह
‘सुबहे-बनारस’ की शांति और शंखनाद से होती हो, वहाँ अचानक उपजे आक्रोश की भयावह चीखें सुनाई देने लगी हैं.हाल ही में घटित दो दिल दहला देने वाली घटनाओं ने सिर्फ दो हंसते-खेलते परिवारों की खुशियां ही नहीं उजाड़ीं, बल्कि उस ‘बनारसीपन’ पर भी गंभीर सवालिया निशान लगा दिया है, जो अपने खुले दिल और मेहमाननवाजी के लिए जाना जाता है. नमो घाट पर एक सीधे-सादे पर्यटक राजेश जायसवाल उर्फ चिंटू की सुरक्षाकर्मियों द्वारा पीट-पीटकर की गई हत्या और घमहापुर में कारोबारी मनीष सिंह की उग्र भीड़ द्वारा की गई निर्मम हत्या ने बनारस की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है. आज हर प्रबुद्ध नागरिक के जेहन में एक ही यक्ष प्रश्न कौंध रहा है— आखिर हमारा समाज इतनी तेजी से हिंसक और संवेदनहीन क्यों होता जा रहा है? क्या संवाद की भाषा पूरी तरह समाप्त हो चुकी है?
आधी रात की सैर बनी मौत का सफर-
24 मई 2026 की तड़के सुबह सोनभद्र निवासी राजेश जायसवाल अपने दोस्तों के साथ काशी घूमने और बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए वाराणसी पहुंचे थे. भीषण गर्मी के बीच गंगा किनारे सुकून तलाशते हुए वे नमो घाट पहुंचे, लेकिन उन्हें अंदाजा नहीं था कि यह यात्रा उनकी जिंदगी की आखिरी यात्रा साबित होगी.
घाट पर तैनात निजी सुरक्षा एजेंसी के गार्डों से मामूली कहासुनी शुरू हुई. प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, बात इतनी बढ़ी कि सुरक्षा गार्डों ने अपने साथियों को बुला लिया और डंडों, बेल्टों व लाठियों से युवकों पर हमला कर दिया. जान बचाने के लिए युवक इधर-उधर भागते रहे, लेकिन हमलावर पीछा कर उन्हें पीटते रहे.
जब तक पुलिस मौके पर पहुंचती, तब तक राजेश जायसवाल गंभीर रूप से घायल होकर जमीन पर गिर चुके थे. अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. वाराणसी की धरती पर एक मेहमान की लाश गिर चुकी थी.
खाकी की त्वरित कार्रवाई: सुरक्षा एजेंसी के संचालक समेत 5 गिरफ्तार-घटना की संवेदनशीलता और जनता के बढ़ते आक्रोश को देखते हुए वाराणसी पुलिस तुरंत हरकत में आई. पुलिस ने इस मामले में चंदौली के रहने वाले पवन यादव व सूरज यादव, वाराणसी के चोलापुर निवासी मनीष यादव, और मिर्जापुर के अदलहाट निवासी राहुल यादव समेत कई अन्य अज्ञात हमलावरों के खिलाफ हत्या और बलवा जैसी गंभीर और गैर-जमानती धाराओं में मुकदमा दर्ज किया.
दबाव बढ़ता देख पुलिस टीमों ने ताबड़तोड़ छापेमारी की और चारों नामजद आरोपियों को दबोच लिया. इसके साथ ही, नियमों को ताक पर रखकर गार्ड्स तैनात करने और इस पूरी आपराधिक लापरवाही के मुख्य जिम्मेदार ‘बाबा विश्वनाथ सिक्योरिटी’ के संचालक अनुज सिंह को भी सलाखों के पीछे भेज दिया गया.
वहीं एसीपी विजय प्रताप सिंह ने बताया कि नमो घाट और आसपास के इलाकों में लगे सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज को बारीकी से खंगाला जा रहा है। फुटेज में दिख रहे अन्य हमलावरों की पहचान की जा रही है, और जल्द ही इस हत्याकांड में शामिल हर एक चेहरे को बेनकाब कर जेल भेजा जाएगा।
सोनभद्र में पसरा मातम: इंसाफ की गुहार लगा रही हैं चीखें-जैसे ही राजेश की मौत की खबर सोनभद्र स्थित उसके पैतृक निवास पर पहुंची, पूरे इलाके में कोहराम मच गया. घर के आंगन से उठने वाली किलकारियां अब चीखों और मातम में बदल चुकी थी. माता-पिता और परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल था. रोते-बिलखते परिजनों ने मुख्यमंत्री और प्रशासन से गुहार लगाई है कि उनके बेटे के कातिलों को ऐसी सजा मिले जो नज़ीर बने.
घमहापुर में भीड़ बनी जल्लाद–
घमहापुर में मनीष सिंह हत्याकांड ने पूरे शहर को फिर झकझोर दिया. 26 अप्रैल 2026 की रात कारोबारी मनीष सिंह की कार से एक महिला को हल्की टक्कर लग गई. मामूली सड़क विवाद देखते ही देखते हिंसक भीड़ में बदल गया.
आरोप है कि गांव के कुछ दबंग युवकों ने मनीष सिंह को पकड़ लिया और करीब 20 मिनट तक बेरहमी से पीटते रहे. ईंट और पत्थरों से सिर पर हमला किया गया. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, भीड़ तमाशबीन बनी रही, लेकिन किसी ने उन्हें बचाने की हिम्मत नहीं की. गंभीर हालत में अस्पताल ले जाए गए मनीष सिंह को डॉक्टर बचा नहीं सके.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हाथ-पैर टूटने और सिर में गंभीर चोट की पुष्टि हुई. एक मामूली टक्कर ने एक परिवार से उसका सहारा छीन लिया.
क्या खत्म हो गया कानून का डर ?
दोनों घटनाओं में सबसे खौफनाक बात यह रही कि हमलावरों को कानून का तनिक भी भय नहीं दिखा. नमो घाट पर सुरक्षाकर्मी खुद कानून हाथ में लेते नजर आए, जबकि घमहापुर में भीड़ ने खुलेआम एक व्यक्ति को मौत के घाट उतार दिया.
इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि समाज में असहिष्णुता तेजी से बढ़ रही है. छोटी-छोटी बातों पर हिंसा, भीड़ मानसिकता और दबदबा दिखाने की प्रवृत्ति अब आम होती जा रही है.
“यह सिर्फ अपराध नहीं, सामाजिक बीमारी है–

मनोचिकित्सक डॉ. श्रेयायांश द्विवेदी के अनुसार, छोटी बातों पर इस तरह की हिंसक प्रतिक्रिया केवल व्यक्तिगत गुस्सा नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक और मानसिक संकट का संकेत है.
उनके मुताबिक, ऐसी घटनाओं के पीछे कई कारण काम करते हैं—
- दबदबा और पहचान बनाने की मानसिकता
- गुस्से पर नियंत्रण की कमी
- शराब और नशे का प्रभाव
- बचपन से विकसित आक्रामक व्यवहार
- कानून का भय कम होना
- खुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझने की प्रवृत्ति
डॉ. द्विवेदी का कहना है कि यह समस्या अब महानगरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों तक फैल चुकी है।
उनके अनुसार समाधान के लिए जरूरी है—
· लोगों में मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक नियंत्रण को लेकर जागरूकता
· कानून का सख्त और निष्पक्ष पालन
· परिवार और स्कूलों में सहानुभूति व संवाद की शिक्षा
· नशे के खिलाफ जागरूकता और नियंत्रण
· समाज में सम्मान और सह-अस्तित्व की सोच को बढ़ावा
काशी की छवि पर गहरा धब्बा-
नमो घाट और घमहापुर की घटनाएं केवल दो हत्याएं नहीं हैं. ये उस बदलती सामाजिक मानसिकता का भयावह चेहरा हैं, जहां संवाद की जगह हिंसा लेती जा रही है और इंसानियत भीड़ के शोर में दबती जा रही है.
काशी हमेशा से प्रेम, सहिष्णुता और अपनत्व की प्रतीक रही है. यहां कहा जाता है—
“काशी में जो आया, वो यहीं का होकर रह गया।”
लेकिन अब सवाल यह है कि क्या वही काशी धीरे-धीरे डर और हिंसा की नगरी बनती जा रही है?
प्रशासन ने दोनों मामलों में कार्रवाई शुरू कर दी है, आरोपी गिरफ्तार किए जा रहे हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी बाकी है—
क्या सिर्फ गिरफ्तारी से समाज की हिंसक मानसिकता बदलेगी, या इसके लिए कानून के साथ सामाजिक चेतना की भी जरूरत है?
